ईरान की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर है जहां अफवाहें और हकीकत आपस में इस कदर उलझ गई हैं कि सच को देख पाना मुश्किल हो गया है। सबसे बड़ा सस्पेंस देश के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई को लेकर है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद उनके बेटे मोजतबा ने कमान संभाली है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि देश के विदेश मंत्री अब्बास अराघची खुद अब तक अपने ही सर्वोच्च नेता से नहीं मिल पाए हैं।
एक देश का विदेश मंत्री, जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने देश का चेहरा होता है, वह अपने ही सबसे बड़े नेता से आमने-सामने बात नहीं कर सका। अराघची ने खुद एक इंटरव्यू में कुबूल किया कि मोजतबा खामेनेई से बहुत ही कम लोगों की मुलाकात हो पाई है। यह सिर्फ एक सुरक्षा प्रोटोकॉल नहीं है, बल्कि इसके पीछे ईरान के भीतर चल रही गहरी राजनीतिक रस्साकशी और सुरक्षा से जुड़े बड़े खतरे हैं।
अगर आप सोच रहे हैं कि यह केवल एक सामान्य सुरक्षा घेरा है, तो आप गलत हैं। इसके पीछे की कहानी बहुत अधिक जटिल है।
पर्दे के पीछे छिपे सुप्रीम लीडर और सुरक्षा का बहाना
ईरान के आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि मोजतबा खामेनेई की यह दूरी केवल सुरक्षा कारणों से है। पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत अमेरिकी और इजरायली हमलों में हुई थी। इस घटना ने तेहरान के सुरक्षा तंत्र को पूरी तरह हिलाकर रख दिया। विदेश मंत्री अराघची ने खुद माना कि जिस वक्त हमला हुआ, वह उसी इमारत के दूसरे हिस्से में मौजूद थे।
ईरान का मानना है कि उनके सुरक्षा तंत्र में एक बड़ा सुराख है, जिसके जरिए दुश्मनों को खुफिया जानकारियां मिल रही हैं। यही वजह है कि मोजतबा खामेनेई को पूरी तरह से जनता और सार्वजनिक जीवन से दूर रखा गया है। यहां तक कि उनके पिता के जनाजे में भी वे नजर नहीं आए। उनके सारे आदेश और बयान केवल लिखित रूप में सामने आते हैं।
ईमानदारी से कहें तो, एक ऐसे माहौल में जहां अपने ही सुरक्षा घेरे पर भरोसा न हो, वहां देश के नए मुखिया को छिपाकर रखना समझ में आता है। लेकिन जब यह दूरी महीनों तक खिंच जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है।
तेहरान में तख्तापलट की गूंज और आंतरिक कलह
मोजतबा खामेनेई की इस अनुपस्थिति ने ईरान के भीतर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। देश के कट्टरपंथी धड़े इस बात से बेहद नाराज हैं। उनका आरोप है कि राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची मिलकर देश चला रहे हैं और सुप्रीम लीडर को दरकिनार कर दिया गया है।
कुछ कट्टरपंथी सांसदों ने तो खुलेआम आरोप लगाया है कि देश में एक तरह का राजनीतिक तख्तापलट हो चुका है। उनका दावा है कि गालिबाफ और उनके सहयोगी मोजतबा की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर अपनी मनमर्जी के फैसले ले रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, इजरायली खुफिया सूत्रों और कुछ विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स का दावा है कि मोजतबा इस समय ईरान में हैं ही नहीं। उनके नाम से जारी होने वाले पत्र और नीतियां रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के कुछ वरिष्ठ अधिकारी मिलकर तैयार कर रहे हैं।
सच जो भी हो, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ईरान का शीर्ष नेतृत्व इस समय गहरे अविश्वास से गुजर रहा है।
रूस के साथ नजदीकी और भविष्य की रणनीति
भले ही मोजतबा खामेनेई देश के विदेश मंत्री से न मिले हों, लेकिन राजनयिक गलियारों में चर्चा है कि उनकी पहली मुलाकात या फोन कॉल किसी ईरानी अधिकारी से नहीं बल्कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ हो सकती है। यह दिखाता है कि ईरान अपने आंतरिक संकट के समय पूरी तरह से मॉस्को पर निर्भर हो रहा है।
अमेरिका और इजरायल के साथ जारी तनाव के बीच ईरान को एक मजबूत साथी की जरूरत है। मोजतबा का पहला कदम क्या होगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन उनके रुख से स्पष्ट है कि वे अपने पिता की तुलना में अधिक आक्रामक नीति अपना सकते हैं। परमाणु कार्यक्रम को लेकर उनकी सोच काफी कट्टर मानी जाती है।
आने वाले दिनों में क्या उम्मीद करें
पश्चिम एशिया पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के लिए यह स्थिति बेहद नाजुक है। ईरान इस समय एक साथ दो मोर्चों पर लड़ रहा है। पहला मोर्चा बाहरी दुश्मनों का है और दूसरा मोर्चा उनके अपने ही घर के भीतर का है। विदेश मंत्री का सुप्रीम लीडर से न मिल पाना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि सरकार के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है।
अगर आप इस क्षेत्र की भू-राजनीति को समझना चाहते हैं, तो आने वाले हफ्तों में तेहरान से आने वाले बयानों और IRGC के कदमों पर पैनी नजर रखनी होगी। ईरान के भीतर की यह खामोशी किसी बड़े तूफान के आने का संकेत भी हो सकती है।