व्हाइट हाउस में जब दो ताकतवर नेता एक ही मेज पर बैठते हैं, तो उनकी बातें हमेशा एक जैसी नहीं होतीं। ईरान संकट को लेकर भी इन दिनों वॉशिंगटन से कुछ ऐसी ही खबरें छनकर आ रही हैं। एक तरफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हैं, जो सोशल मीडिया पर हर दूसरे दिन ईरान के पावर प्लांट और पुलों को उड़ाने की धमकी दे रहे हैं। दूसरी तरफ उपराष्ट्रपति जेडी वेंस हैं, जो चुपचाप स्विट्जरलैंड और ओमान में कूटनीति के जरिए समझौते की जमीन तैयार कर रहे हैं।
अब लोग पूछ रहे हैं कि क्या ट्रंप और वेंस के सुर वाकई अलग हैं? क्या अमेरिका की ईरान नीति में कोई बड़ा बिखराव आ चुका है? Also making news in this space: Why The Daniel Andrews Sculpture Plan Finally Collapsed Under Its Own Weight.
इस सवाल का सीधा जवाब यह है कि यह कोई अंतर्विरोध नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का पुराना 'गुड कॉप, बैड कॉप' ड्रामा है। लेकिन यह खेल जितना सीधा दिखता है, हकीकत में उतना है नहीं। ट्रंप का गुस्सा और वेंस की बातचीत की मेज, दोनों मिलकर ईरान पर एक खास तरह का दबाव बना रहे हैं। आइए समझते हैं कि पर्दे के पीछे आखिर चल क्या रहा है।
स्विट्जरलैंड से ओमान तक वेंस की कूटनीति का सच
जून 2026 में स्विट्जरलैंड के बर्गनस्टॉक रिजॉर्ट में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत शुरू हुई थी। इस बातचीत की अगुवाई खुद जेडी वेंस कर रहे थे। ईरान के साथ एक अस्थाई समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर भी हुए, जिसके तहत ईरान ने संयुक्त राष्ट्र के परमाणु निरीक्षकों को अपने देश में वापस आने की अनुमति देने पर सहमति जताई। Further details into this topic are covered by Wikipedia.
लेकिन इस पूरी बातचीत के दौरान माहौल बेहद तनावपूर्ण था। स्विट्जरलैंड में ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने जेडी वेंस से हाथ मिलाने तक से परहेज किया और कूटनीतिक प्रोटोकॉल को दरकिनार कर दिया। इस असहज स्थिति के बावजूद वेंस ने बातचीत जारी रखने पर जोर दिया। उनका साफ कहना था कि बातचीत ही एकमात्र रास्ता है जिससे इस संकट को टाला जा सकता है।
इसके ठीक विपरीत, डोनाल्ड ट्रंप उसी दौरान सोशल मीडिया पर चेतावनी दे रहे थे कि यदि ईरान ने अपनी हरकतें बंद नहीं कीं, तो उस पर ऐसा हमला होगा जो उसने कभी नहीं देखा होगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य की जंग और 'गलती हो गई' वाला कबूलनामा
इस पूरे संकट के केंद्र में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) है। यह दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्ग है जहां से वैश्विक तेल का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। जब ईरान ने इस मार्ग को बंद करने और जहाजों पर हमला करने की कोशिश की, तो अमेरिकी सेना ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ईरान के तटीय रडार और मिसाइल ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए।
इस भारी सैन्य दबाव का असर भी दिखने लगा है। अमेरिकी खुफिया अधिकारियों के हवाले से खबर आई कि ओमान में हुई गुप्त बातचीत के दौरान ईरानी प्रतिनिधियों ने स्वीकार किया कि उनसे "गलती हो गई" थी। ईरान ने दावा किया कि जहाजों पर हमले सेना के एक बागी गुट ने किए थे, जिनका सरकार से कोई लेना-देना नहीं था।
- ईरान की दलील: जहाजों पर हमला एक उग्रवादी धड़े की गलती थी।
- ट्रंप का स्टैंड: हमें ईरान का लिखित और सार्वजनिक माफीनामा चाहिए।
- वेंस का स्टैंड: हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि क्या ईरान परमाणु निरीक्षकों को सच में अनुमति दे रहा है।
क्या ट्रंप और वेंस के बीच सच में कोई मतभेद है?
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि वेंस युद्ध से बचना चाहते हैं, जबकि ट्रंप एक बड़ा युद्ध शुरू करने के मूड में हैं। इस चर्चा को खुद जेडी वेंस ने खारिज किया है। वेंस का कहना है कि राष्ट्रपति ट्रंप और उनके बीच कोई नीतिगत मतभेद नहीं है।
वेंस ने मीडिया पर आरोप लगाते हुए कहा कि कुछ ताकतें प्रशासन के भीतर दरार दिखाने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ट्रंप का लक्ष्य भी शांति स्थापित करना ही है, लेकिन वे इसे 'ताकत के जरिए शांति' (Peace through strength) के फॉर्मूले से हासिल करना चाहते हैं।
वेंस ने इजरायली नेताओं पर भी निशाना साधा है। उनका मानना है कि इजरायल के कुछ नेता इस युद्ध को लंबा खींचना चाहते हैं, जबकि अमेरिका चाहता है कि यह संघर्ष जल्द से जल्द खत्म हो और वैश्विक व्यापार सामान्य हो सके।
क्या हैं आगे के रास्ते?
ईरान के साथ इस तनाव को खत्म करने के लिए अमेरिका के सामने अब सीमित विकल्प बचे हैं। इस दिशा में तत्काल उठाए जाने वाले कदम कुछ इस तरह होने चाहिए:
- होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा: सबसे पहली प्राथमिकता इस समुद्री मार्ग को हर हाल में खुला रखना है। यदि व्यापारिक जहाजों पर हमले जारी रहते हैं, तो कोई भी समझौता टिक नहीं पाएगा।
- लिखित गारंटी: ट्रंप प्रशासन को केवल ईरानी बयानों पर भरोसा करने के बजाय एक औपचारिक, हस्ताक्षरित समझौते पर जोर देना चाहिए।
- परमाणु निगरानी: ईरान के परमाणु ठिकानों (जैसे पिकैक्स माउंटेन) पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों की कड़े स्तर पर वापसी सुनिश्चित होनी चाहिए।
डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक धमकियां और जेडी वेंस की शांत कूटनीति असल में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब तक मेज पर बातचीत चल रही है, तब तक ट्रंप की धमकियां ईरान को पीछे हटने पर मजबूर करती रहेंगी। लेकिन अगर कूटनीति पूरी तरह फेल हो जाती है, तो फिर मध्य पूर्व में एक ऐसे युद्ध की शुरुआत हो सकती है जिसे रोकना किसी के बस में नहीं होगा।