क्या ट्रंप का गोल्डन डोम वाकई अमेरिका को पूरी तरह सुरक्षित बना पाएगा

क्या ट्रंप का गोल्डन डोम वाकई अमेरिका को पूरी तरह सुरक्षित बना पाएगा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षी रक्षा योजना को मिली बड़ी कामयाबी ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। हाल ही में अमेरिकी रक्षा विभाग ने ऐलान किया कि उनके नए मिसाइल डिफेंस सिस्टम गोल्डन डोम ने पास किया पहला इंटरसेप्ट टेस्ट। इस परीक्षण की सफलता के बाद वाशिंगटन में उत्साह का माहौल है। लेकिन क्या यह तकनीक सच में उतनी अचूक है जितना दावा किया जा रहा है?

रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने सोशल मीडिया पर इस टेस्ट के कामयाब होने की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि इस टेस्ट के दौरान डायनेमिक डिफेंस ऑटोनॉमस डिफीट यानी DDAD सिस्टम ने खुद ही दुश्मनों के ड्रोन और क्रूज मिसाइलों की पहचान की और उन्हें हवा में ही नष्ट कर दिया। यह पूरा टेस्ट तय समय पर हुआ और इसने सभी लक्ष्यों को मार गिराया।


स्टार वॉर्स की याद दिलाता नया सुरक्षा कवच

ट्रंप सरकार का यह प्रोजेक्ट पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के 1980 के दशक के 'स्ट्रैटेजिक डिफेंस इनीशिएटिव' यानी स्टार वॉर्स प्रोग्राम की याद दिलाता है। इजराइल के आयरन डोम से प्रेरणा लेकर बने इस सिस्टम का नाम भले ही उससे मिलता-जुलता हो, लेकिन इसका दायरा बहुत बड़ा है। यह सिर्फ छोटे रॉकेटों को रोकने के लिए नहीं है। इसका मकसद अंतरिक्ष से लेकर जमीन तक एक ऐसा जाल बिछाना है जो बड़े परमाणु मिसाइलों और हाइपरसोनिक हथियारों को भी रोक सके।

इस परीक्षण में अत्याधुनिक डायरेक्टेड एनर्जी यानी लेजर जैसी तकनीकों का इस्तेमाल हुआ। जब दुश्मन की मिसाइलें अपनी शुरुआती रफ्तार पकड़ रही होती हैं, तभी अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स उनकी गर्मी को पकड़ लेते हैं। इसके बाद ऑटोमेटेड सिस्टम तुरंत एक्शन में आता है। बिना किसी इंसानी देरी के खतरे को खत्म कर दिया जाता है।

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खर्च और तकनीक पर उठते गंभीर सवाल

जमीन पर परीक्षण पास करना एक बात है, लेकिन इसे पूरी दुनिया के पैमाने पर लागू करना बिल्कुल अलग कहानी है। कई रक्षा विशेषज्ञ इसके खर्च को लेकर चिंता जता रहे हैं। व्हाइट हाउस ने शुरुआत में इसका बजट लगभग 175 अरब डॉलर बताया था। अमेरिकी कांग्रेस के बजट कार्यालय यानी CBO के नए अनुमानों के मुताबिक अगले 20 सालों में इस पर 1.2 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का खर्च आ सकता है।

लागत के अलावा भी कई व्यावहारिक चुनौतियां हैं। अंतरिक्ष आधारित इस सिस्टम को काम करने के लिए निचले अर्थ ऑर्बिट में हजारों सैटेलाइट्स की जरूरत होगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि रूस या चीन जैसे बड़े देशों के बड़े मिसाइल हमलों को रोकने के लिए जितने सैटेलाइट्स चाहिए, उनकी संख्या संभालना बेहद मुश्किल होगा। अगर अंतरिक्ष में इतने हथियार तैनात किए गए, तो इससे दुनिया में एंटी-सैटेलाइट हथियारों की एक नई होड़ शुरू हो सकती है।

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आगे की राह और वास्तविक कदम

इस शुरुआती कामयाबी के बाद अमेरिकी रक्षा विभाग अब इसके अगले चरणों पर काम शुरू कर रहा है। आने वाले महीनों में इस सिस्टम का और अधिक जटिल परिस्थितियों में परीक्षण किया जाएगा। अमेरिकी सरकार की योजना साल 2028 के अंत तक इसका एक बड़ा और अंतिम प्रदर्शन करने की है।

विपक्ष और कई स्वतंत्र संगठन इस पर पैनी नजर रखे हुए हैं। उनका कहना है कि इतने भारी बजट को पारंपरिक सेना या आम जनता की भलाई में लगाया जा सकता था। बहरहाल, ट्रंप प्रशासन इस प्रोजेक्ट को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानकर आगे बढ़ रहा है। सुरक्षा की दुनिया में यह नया प्रयोग सफल होता है या सिर्फ एक महंगा सपना बनकर रह जाता है, यह आने वाला वक्त ही तय करेगा।

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Emily Russell

An enthusiastic storyteller, Emily Russell captures the human element behind every headline, giving voice to perspectives often overlooked by mainstream media.