स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में चल रही हाई-स्टेक्स बातचीत के बीच एक छोटा सा वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया। लोग दावा करने लगे कि कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी ने अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस को नजरअंदाज कर दिया। इंटरनेट पर इसे वेंस की बड़ी फजीहत और कतर द्वारा अमेरिका के कूटनीतिक अपमान के रूप में पेश किया जाने लगा। लेकिन क्या अंतरराष्ट्रीय कूटनीति इतनी सीधी और सतही होती है? कतई नहीं।
इस वायरल फुटेज के पीछे की पूरी कहानी और इसके असल भू-राजनीतिक मायने सोशल मीडिया की सनसनी से कहीं ज्यादा गहरे हैं। यह वाकया उस समय का है जब अमेरिका, ईरान, पाकिस्तान और कतर के शीर्ष प्रतिनिधि मध्य पूर्व में जारी तनाव को कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण फ्रेमवर्क पर चर्चा करने जुटे थे। कैमरे में जो दिखा वह कोई सोची-समझी कूटनीतिक बेरुखी नहीं बल्कि प्रोटोकॉल और उस वक्त कमरे के माहौल की एक तात्कालिक स्थिति थी। If you found value in this piece, you should check out: this related article.
सोशल मीडिया के दावों और असल हकीकत का अंतर
वायरल हो रहे वीडियो में कतर के प्रधानमंत्री स्वागत क्षेत्र में आते हैं। वहां अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस भी मौजूद थे। कतरी नेता सीधे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की तरफ बढ़ते हैं। वे उनसे गर्मजोशी से हाथ मिलाते हैं और गले मिलते हैं। इस दौरान वेंस थोड़ा पीछे खड़े दिखाई देते हैं। इंटरनेट यूजर्स ने तुरंत निष्कर्ष निकाल लिया कि कतर ने जानबूझकर अमेरिकी उप-राष्ट्रपति से हाथ नहीं मिलाया।
सच्चाई यह है कि इस बैठक के लिए चारों पक्षों के बीच कोई आधिकारिक संयुक्त फोटो सेशन तय ही नहीं हुआ था। जब कतर और पाकिस्तान के नेता आपस में मिल रहे थे तब वेंस कमरे के दूसरे हिस्से में अपने सहयोगियों के साथ खड़े थे। किसी भी देश की सरकार या कूटनीतिक मिशन ने इस घटना को अपमानजनक नहीं माना है। खुद वेंस ने बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में कतरी और पाकिस्तानी मध्यस्थों की जमकर तारीफ की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि क्षेत्र में शांति बहाल करने के लिए कतर एक बेहतरीन साझेदार के रूप में काम कर रहा है। For another angle on this event, refer to the recent update from NPR.
पर्दे के पीछे ईरान का कड़ा रुख और फोटो-ऑप का खेल
इस बैठक में असली कूटनीतिक ड्रामा कतर के पीएम और वेंस के बीच नहीं बल्कि ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा था। इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन के तहत हो रही इस वार्ता में ईरानी प्रतिनिधिमंडल बेहद सख्त रवैया अपनाए हुए था। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराक्ची और मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बगेर गालिबफ ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ किसी भी तरह के संयुक्त फोटो सेशन का हिस्सा बनने से साफ इनकार कर दिया था।
जब अब्बास अराक्ची बैठक कक्ष में दाखिल हुए तो उन्होंने पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ से मुलाकात की। उस कमरे में जेडी वेंस के साथ डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जारेड कुशनर और अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ भी मौजूद थे। अराक्ची ने अमेरिकी दल की तरफ देखा तक नहीं और केवल पाकिस्तानी नेताओं से औपचारिकताएं पूरी कर वहां से निकल गए। ईरानी सरकारी मीडिया ने इसे अमेरिका के खिलाफ एक कड़े संदेश के रूप में प्रसारित किया। वहीं अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार ईरान पहले मीडिया अपीयरेंस के लिए सहमत हुआ था लेकिन बाद में अपने रुख से पलट गया।
कतर की मजबूरी और नाजुक संतुलन बनाने की कोशिश
कतर इस पूरी वार्ता में सबसे नाजुक भूमिका निभा रहा है। एक तरफ वह अमेरिका का बेहद करीबी सुरक्षा साझेदार है और वहां बड़ा अमेरिकी सैन्य बेस मौजूद है। दूसरी तरफ ईरान के साथ भी उसके मजबूत कामकाजी और कूटनीतिक संबंध हैं। जब ईरान ने अमेरिका के साथ सीधे कैमरे के सामने आने से मना कर दिया तो कतरी प्रधानमंत्री के लिए भी प्रोटोकॉल का पालन करना चुनौतीपूर्ण हो गया।
ईरानी समकक्ष की मौजूदगी में कतर के पीएम का अमेरिकी उप-राष्ट्रपति से बहुत ज्यादा गर्मजोशी दिखाना कूटनीतिक संतुलन को बिगाड़ सकता था। ईरान पहले से ही बातचीत की मेज छोड़ने के बहाने ढूंढ रहा था। बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति के एक कथित बयान को आधार बनाकर ईरानी दल कुछ समय के लिए वार्ता से बाहर भी हो गया था। ऐसे माहौल में कतरी प्रधानमंत्री का व्यवहार केवल इस बात का संकेत था कि वे ईरान को बिना नाराज किए वार्ता की मेज पर बनाए रखना चाहते थे।
आगे की राह और कूटनीतिक चुनौतियां
इस बैठक का मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय संघर्ष को रोकने के लिए एक ठोस रास्ता तलाशना था। भले ही कैमरे के सामने कुछ असहज पल दिखे हों लेकिन पर्दे के पीछे की तकनीकी बातचीत अभी भी जारी है। कतर और पाकिस्तान लगातार दोनों महाशक्तियों के बीच संदेशों का आदान-प्रदान करवा रहे हैं।
इस घटना से साफ है कि अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में केवल बयानों का ही महत्व नहीं होता बल्कि नेताओं के हाव-भाव और कमरे का माहौल भी बहुत कुछ तय करता है। यदि आप इस तरह के घटनाक्रमों को समझना चाहते हैं तो सोशल मीडिया की छोटी क्लिपों के आधार पर राय बनाना बंद करें। किसी भी कूटनीतिक बैठक के नतीजों का आकलन हमेशा उसके आधिकारिक साझा बयानों और लागू होने वाली नीतियों से किया जाना चाहिए न कि इस बात से कि किसने पहले किससे हाथ मिलाया।